मंगलवार, 10 जुलाई 2012

एक पुल है कि बनता नहीं ... !!


एक पुल है कि बनता नहीं ... !!

              बड़ी इच्छा शक्ति और उत्साह से एक बड़ा समारोह करके उस पुल का शिलान्यास हुआ ... पैसों कि कमी उसके निर्माण में आड़े नहीं आये इसके पुख्ता इन्तेजाम हुए ... पुल निर्माण में माहिर ठेकेदारों को बुलाया गया ... एक अच्छे गुणवंत ठेकेदार का चयन हुआ ... योग्य इंजिनियर इस काम में लगे ... कोई कोर - कसर बाकि न रहे इस हेतु आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल का विचार हुआ ... बड़ी-बड़ी मशीनें आई ... निर्माण में गुणवत्ता कि कसमें खायी ... हल्ला गुल्ला हुआ ... निर्माण में बाधा न पहुंचे इस हेतु जनता कि आवाजाही को बाधित किया ... क्या क्या न किया पर पुल हैं कि बनता नहीं ? 

                     पांच - छः साल हुए इस बात को ... उसके निर्माण कि खबरें जब आना शुरू हुयी थी ... मेरे पिता अख़बारों में इस खबर को पढ़कर बहुत खुश हो जाया करते थे ... और मैं था कि बचपन में सुने किस्से कहानियों से बनी धारणा से  आगे अपनी सोच को टस से मस करने को राजी नहीं था . बचपने में जब मैं छुट्टियों में मामा के घर जाता,  तो वहां बहने वाली नदी में स्नान का लुत्फ़ उठाना हम बच्चों का प्रिय शगल होता . .. नदी स्नान के बाद भी कहाँ सीधे घर जाते !! ... वहीँ नदी पर बने पुल और उसके किस्से कहानियों की दावत उड़ती ... तभी कोई सबकों तिलस्मी हावभावों से चौकाकर यह कहता की ... कान देकर सुनों !... मैंने सुना हैं ! ... और ये एकदम सच्ची हैं !!  ... ये पुल बड़ी मुश्किलों से बना हैं ... यह तो बनता और बार बार गिर जाता ... फिर इसे बलि देना पड़ी ... जितने खम्बे उतने इनसानों की बलि खाकर इसका एक- एक पाया खड़ा हुआ हैं ... और हम सब बच्चे अजीब से रोमांच में डूब जाते ... फिर तो बार बार हर कोई बलि की घटनाओं को अपने ठंग से कहता ... पर मजाल हैं कोई बोरियत हो ... अमूमन हमेशा नदी , उसका पुल ..और पुल की मांगी बलि के किस्से जैसे हमारे लिए आजकल के टीवी धारावाहिकों  से थे .

               वैसे मैं क्या हम सब इस क्षेत्र के रहवासी भूल चुके हैं कि यहाँ कोई पुल भी बन रहा हैं ... उसके पास से निकल भी जाएँ तो नजरें उधर नहीं जाती ... जैसे सबने अब तय मान लिया हैं की ... यह पुल नहीं बन सकता... पर आज उस पुल से जुडी खबर ने याद दिलाया तो याद आये  ... वहीं बचपन का नदी स्नान ... वही पुल ... और वही किस्से ... पर बलि ... ना बाबा ना ... ये पुल ना बने तो ना बने ... इसके अधूरे निर्माण को किसी खंडहर की तरह विकसित किया जाएँ ... क्योंकि वे बलि नहीं मांगते... जीर्ण - शीर्ण होकर भी ... धुल धूसरित होकर भी लुभाते तो हैं ... कुछ पलों के लिए ही सही ... सपनों की नईदुनिया में ले जाते तो हैं .


         मानो या ना मानो ... सच कहता हूँ !!  ... पुल निर्माण में हम बड़े फिसड्डी हैं ... और दीवारें बनाने   में उतने ही माहिर .... हमने जातियां बनायीं ... पर जाति-पाती के बीच पुल नहीं बना पायें ... हमने उंच - नीच बनायीं  .. पर उंच -नीच के  बीच पुल नहीं बना पायें ... हमने सम्प्रदाय  बनाये ... पर उनके  बीच फिर पुल नहीं बना . हमने सरहदे बनायीं पर पुल बनाना फिर नहीं आया . यहाँ तक की हमने बड़े-बड़े धर्मों की खोज की पर उनके बीच निस्सार को परें कर सार नहीं खोज पायें ... वे आपस में एक हो पायें ... कहीं कोई पुल बन जाएँ .... पर हाँ ...  यहाँ हमने एक काम जरूर किया ... जिसने भी कभी इन्सान - इन्सान के बीच पुल बनने की कोशिश की ... कहीं पुल बन जाएँ इस इरादे से .... उसकी बलि जरूर ली ... कुछ भी हो उनका बलिदान काम आयें ... पुल जरूर बन जाएँ ... पुल जरूर बन जाएँ .
   

4 टिप्‍पणियां:

विष्णु बैरागी ने कहा…

देश की प्रगति में बाधाक मूल मुद्दे को आपने बडीही रोचकता से उठाया है। बहुत ही बढिया बात कही है आपने - पुल निर्माण में हम बड़े फिसड्डी हैं।
आप अनुमति दें तो इस पंक्ति को, आवश्‍यकतानुसार उद्ध्‍दृत कर लूँ।

विष्णु बैरागी ने कहा…

इस ब्‍लॉग को ई-मेल से प्राप्‍त करने का प्रावधान उपलब्‍ध कराऍं।

सम्पजन्य ने कहा…

Sir ... you can do all... as you desire ... no doubt they will refine more... Thanks.

सम्पजन्य ने कहा…

Please guide me in this regards ... so I may able to do so ... in fact ... after many efforts I could not get it....